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अरदास

 सुलगते सपन नैन मुंह ताकते हैं।  हम आशा संजोए कदम साधते हैं।।  उठा है भरोसा,  ना वादा ना किस्सा,   सजा फिर सँवारे धरा मांगते हैं।।  बुझा दे ना आंधी, ये साँसों के दीपक,   इसी कशमकश में दिए हाँफते हैं।।  ये कमसिन हवा भी,  ना छू जाए उनको,   इसी डर से पत्ते कली ढाँपते हैं ।। ये नीड़ों की टूटन, ना दिख जाए उनको,   यही सोच पंछी न घर झाँकते हैं।।  हैं वीरां शहर ये,  ना मिलना- बिछड़ना,   उम्मीदों से अपनी उमर मांगते हैं।।  ना हो खत्म जीवन ना रिश्ते, ना अपने,  ये जोड़े हुए कर, दुआ मांगते हैं।। समंदर भी छोटा, लगा था जिन्हें कल, वो डर-डर के इक-इक लहर नापते हैं।।K रश्मि लहर लखनऊ

यादें

 कुछ यादों का क्या कहना  भरी आँख से बह आती है! गाँव नहरिया मंदिर छूटे द्वार आँगना गोबर लीपे। शगुन पहर नूपुर बन जीते मनस पटल स्मित लाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... सरगम आँगन सखी सहेजे माँ बाबू का कमरा छूके। सोहर बन्ना मेहँदी हल्दी ढोल थाप संग नच जाती हैं। कुछ यादों का क्या कहना ... कौन कहेगा सालों बीते  कलश रंगोली पीहर रीते। मंगल गान चुनरिया ओढ़े घूम मायका सब आती है। कुछ यादों का क्या कहना ... अमिया भुट्टे बरगद धागा साँझ के दिये और बाती को। तेरी याद बहुत आती है कान मे चुपके कह जाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... रश्मि लहर, लखनऊ

किया तो था!

अंतस ने भावों का हौले - हौले श्रृंगार किया तो था। सब मुझे याद है, आँखों ने सपनों से प्यार किया तो था।। वो सजी कल्पनाओं की गठरी- सी, बैठी थी आँगन में, तब मौन ने उसके, भीगा-भीगा- सा मनुहार किया तो था।। थे चले जा रहे साथ छोड़, गाँवों को उसके अंश सभी, डबडबाए आँसुओं ने गिरने से  इन्कार किया तो था। तब उसने यह संसार जिया था, देश प्रेम को ऊपर रख, उसकी आँखों ने अपने सुख- दुख का व्यापार किया तो था। जब सज कर लौटा था शहीद, चौखट से बंदनवार गिरा, तब बच्चे फफक पड़े, पत्नी ने भी चीत्कार किया तो था।। रश्मि लहर, लखनऊ