अरदास

 सुलगते सपन नैन मुंह ताकते हैं। 

हम आशा संजोए कदम साधते हैं।।


 उठा है भरोसा,  ना वादा ना किस्सा, 

 सजा फिर सँवारे धरा मांगते हैं।।


 बुझा दे ना आंधी, ये साँसों के दीपक, 

 इसी कशमकश में दिए हाँफते हैं।।


 ये कमसिन हवा भी,  ना छू जाए उनको,  

इसी डर से पत्ते कली ढाँपते हैं ।।


ये नीड़ों की टूटन, ना दिख जाए उनको,  

यही सोच पंछी न घर झाँकते हैं।।


 हैं वीरां शहर ये,  ना मिलना- बिछड़ना,  

उम्मीदों से अपनी उमर मांगते हैं।।


 ना हो खत्म जीवन ना रिश्ते, ना अपने,

 ये जोड़े हुए कर, दुआ मांगते हैं।।


समंदर भी छोटा, लगा था जिन्हें कल,

वो डर-डर के इक-इक लहर नापते हैं।।K


रश्मि लहर

लखनऊ

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बहुत है..

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