संदेश

विरोध

"अम्मा जी!  ननदोई जी के साथ  हम होली नहीं खेलेंगे, उनके ढंग ठीक नहीं हैं। वो होली के बहाने इधर–उधर छूने लगते हैं!" कहते–कहते शिप्रा का चेहरा क्रोध से भर गया! "देख बहू! तुम्हारे ननदोई बड़े आदमी हैं .. अगर जरा-बहुत हाथ लग भी जाए , तो इग्नोर कर दिया करो, ऐसी बातें कही नहीं जाती हैं , औरतों को थोड़ा सहनशील होना चाहिये।"  अपने मुँह में पान की गिलौरी रखते हुए शिप्रा की सास ने जवाब दिया ... "नहीं दादी! अबकि अगर फूफा जी ने मम्मी को जरा भी रंग लगाया तो जान लेना ...सलाद की जगह उनका हाथ काट डालूॅंगी और सबूत भी नहीं छोड़ूँगी! खबरदार ! जो किसी ने मेरी माँ की तरफ आँख भी उठाई तो।" अपने हाथ से चाकू की धार को छूते हुए शिप्रा की बेटी, जो कि एक शेफ थी,  बीच में बोल पड़ी ... एक चुभन भरा सन्नाटा चीख पड़ा। रश्मि 'लहर' लखनऊ उत्तर प्रदेश 

ना जाने कब!

 न जाने कब .. खो जाती हैं .. वो लगभग.. अमर हुई सी बातें सपनों जैसे सच!  प्यार में पगे शख्स एक दूसरे को दुलराती सी शामें..  जिनमें  हो जाते थे खर्च समूचे से हम.. बिना अर्थ न जाने कब! रश्मि लहर, लखनऊ

बहुत है..

 विरह व्यथा उर भरी बहुत है। एक प्रेम की घड़ी बहुत है। जब-जब तुलसी को सींचा है,  नागफनी भी लड़ी बहुत है। अंर्तमन का तम अकुलाया, गोद-चाँदनी भरी बहुत है। आँगन कैसे रहे अछूता,  वायु पश्चिमी चली बहुत है। बाँट दिशा भूगोल पढ़ाया, यादगार ये घड़ी बहुत है। न बन पाया टूटा चश्मा, लिस्ट काम की बड़ी बहुत है। स्वाभिमान से करो किनारा, उम्र तुम्हारी पड़ी बहुत है। अपने-अपने राम गढ़ो अब, अगली पीढ़ी पढ़ी बहुत है। पीठा चावल से रूठा है, ये दीवार अब झरी बहुत है।। हासिल यूँ तो पूरा जग है, भूख पेट की बढ़ी बहुत है। सर भारी-भारी न कर दे, पगड़ी तेरी बड़ी बहुत है। रश्मि लहर, लखनऊ

अरदास

 सुलगते सपन नैन मुंह ताकते हैं।  हम आशा संजोए कदम साधते हैं।।  उठा है भरोसा,  ना वादा ना किस्सा,   सजा फिर सँवारे धरा मांगते हैं।।  बुझा दे ना आंधी, ये साँसों के दीपक,   इसी कशमकश में दिए हाँफते हैं।।  ये कमसिन हवा भी,  ना छू जाए उनको,   इसी डर से पत्ते कली ढाँपते हैं ।। ये नीड़ों की टूटन, ना दिख जाए उनको,   यही सोच पंछी न घर झाँकते हैं।।  हैं वीरां शहर ये,  ना मिलना- बिछड़ना,   उम्मीदों से अपनी उमर मांगते हैं।।  ना हो खत्म जीवन ना रिश्ते, ना अपने,  ये जोड़े हुए कर, दुआ मांगते हैं।। समंदर भी छोटा, लगा था जिन्हें कल, वो डर-डर के इक-इक लहर नापते हैं।।K रश्मि लहर लखनऊ

यादें

 कुछ यादों का क्या कहना  भरी आँख से बह आती है! गाँव नहरिया मंदिर छूटे द्वार आँगना गोबर लीपे। शगुन पहर नूपुर बन जीते मनस पटल स्मित लाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... सरगम आँगन सखी सहेजे माँ बाबू का कमरा छूके। सोहर बन्ना मेहँदी हल्दी ढोल थाप संग नच जाती हैं। कुछ यादों का क्या कहना ... कौन कहेगा सालों बीते  कलश रंगोली पीहर रीते। मंगल गान चुनरिया ओढ़े घूम मायका सब आती है। कुछ यादों का क्या कहना ... अमिया भुट्टे बरगद धागा साँझ के दिये और बाती को। तेरी याद बहुत आती है कान मे चुपके कह जाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... रश्मि लहर, लखनऊ

किया तो था!

अंतस ने भावों का हौले - हौले श्रृंगार किया तो था। सब मुझे याद है, आँखों ने सपनों से प्यार किया तो था।। वो सजी कल्पनाओं की गठरी- सी, बैठी थी आँगन में, तब मौन ने उसके, भीगा-भीगा- सा मनुहार किया तो था।। थे चले जा रहे साथ छोड़, गाँवों को उसके अंश सभी, डबडबाए आँसुओं ने गिरने से  इन्कार किया तो था। तब उसने यह संसार जिया था, देश प्रेम को ऊपर रख, उसकी आँखों ने अपने सुख- दुख का व्यापार किया तो था। जब सज कर लौटा था शहीद, चौखट से बंदनवार गिरा, तब बच्चे फफक पड़े, पत्नी ने भी चीत्कार किया तो था।। रश्मि लहर, लखनऊ