विरह व्यथा उर भरी बहुत है। एक प्रेम की घड़ी बहुत है। जब-जब तुलसी को सींचा है, नागफनी भी लड़ी बहुत है। अंर्तमन का तम अकुलाया, गोद-चाँदनी भरी बहुत है। आँगन कैसे रहे अछूता, वायु पश्चिमी चली बहुत है। बाँट दिशा भूगोल पढ़ाया, यादगार ये घड़ी बहुत है। न बन पाया टूटा चश्मा, लिस्ट काम की बड़ी बहुत है। स्वाभिमान से करो किनारा, उम्र तुम्हारी पड़ी बहुत है। अपने-अपने राम गढ़ो अब, अगली पीढ़ी पढ़ी बहुत है। पीठा चावल से रूठा है, ये दीवार अब झरी बहुत है।। हासिल यूँ तो पूरा जग है, भूख पेट की बढ़ी बहुत है। सर भारी-भारी न कर दे, पगड़ी तेरी बड़ी बहुत है। रश्मि लहर, लखनऊ
कुछ यादों का क्या कहना भरी आँख से बह आती है! गाँव नहरिया मंदिर छूटे द्वार आँगना गोबर लीपे। शगुन पहर नूपुर बन जीते मनस पटल स्मित लाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... सरगम आँगन सखी सहेजे माँ बाबू का कमरा छूके। सोहर बन्ना मेहँदी हल्दी ढोल थाप संग नच जाती हैं। कुछ यादों का क्या कहना ... कौन कहेगा सालों बीते कलश रंगोली पीहर रीते। मंगल गान चुनरिया ओढ़े घूम मायका सब आती है। कुछ यादों का क्या कहना ... अमिया भुट्टे बरगद धागा साँझ के दिये और बाती को। तेरी याद बहुत आती है कान मे चुपके कह जाती है। कुछ यादों का क्या कहना ... रश्मि लहर, लखनऊ
सुलगते सपन नैन मुंह ताकते हैं। हम आशा संजोए कदम साधते हैं।। उठा है भरोसा, ना वादा ना किस्सा, सजा फिर सँवारे धरा मांगते हैं।। बुझा दे ना आंधी, ये साँसों के दीपक, इसी कशमकश में दिए हाँफते हैं।। ये कमसिन हवा भी, ना छू जाए उनको, इसी डर से पत्ते कली ढाँपते हैं ।। ये नीड़ों की टूटन, ना दिख जाए उनको, यही सोच पंछी न घर झाँकते हैं।। हैं वीरां शहर ये, ना मिलना- बिछड़ना, उम्मीदों से अपनी उमर मांगते हैं।। ना हो खत्म जीवन ना रिश्ते, ना अपने, ये जोड़े हुए कर, दुआ मांगते हैं।। समंदर भी छोटा, लगा था जिन्हें कल, वो डर-डर के इक-इक लहर नापते हैं।।K रश्मि लहर लखनऊ
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