ना जाने कब!

 न जाने कब ..

खो जाती हैं ..

वो लगभग..

अमर हुई सी बातें

सपनों जैसे सच! 

प्यार में पगे शख्स

एक दूसरे को दुलराती सी शामें.. 

जिनमें  हो जाते थे खर्च

समूचे से हम.. बिना अर्थ

न जाने कब!


रश्मि लहर,

लखनऊ

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