बहुत है..
विरह व्यथा उर भरी बहुत है।
एक प्रेम की घड़ी बहुत है।
जब-जब तुलसी को सींचा है,
नागफनी भी लड़ी बहुत है।
अंर्तमन का तम अकुलाया,
गोद-चाँदनी भरी बहुत है।
आँगन कैसे रहे अछूता,
वायु पश्चिमी चली बहुत है।
बाँट दिशा भूगोल पढ़ाया,
यादगार ये घड़ी बहुत है।
न बन पाया टूटा चश्मा,
लिस्ट काम की बड़ी बहुत है।
स्वाभिमान से करो किनारा,
उम्र तुम्हारी पड़ी बहुत है।
अपने-अपने राम गढ़ो अब,
अगली पीढ़ी पढ़ी बहुत है।
पीठा चावल से रूठा है,
ये दीवार अब झरी बहुत है।।
हासिल यूँ तो पूरा जग है,
भूख पेट की बढ़ी बहुत है।
सर भारी-भारी न कर दे,
पगड़ी तेरी बड़ी बहुत है।
रश्मि लहर,
लखनऊ
आदरणीया रश्मि लहर जी आपकी रचना ह्रदय स्पर्शी लगी ।एक- एक शब्द सुंदर ,सटीक और सार्थक ,विशेषकर तुकांत शब्द ,बहुत मन को भा गये ।अच्छा सशक्त लिखते हैं आप ।
जवाब देंहटाएंसादर बधाई - शुभकामनाएँ ।
--- शशिशेखर त्रिपाठी (SS)
हार्दिक धन्यवाद जी
हटाएंअद्बुत रचना है कमाल
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद जी
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